Monday, 23 July 2018

चातुरमास की महीमा



चातुरमास की महीमा
श्री हरी कहते है – हे धर्मराज सुनो, चातुर्मास मे किये जान वाले पुण्य और उनके परिणाम

१.    जो व्यक्ति मंदिर को सुन्दर पुष्प से सजाता है , जो मंदिर मे सफ़ाई करता है और रास्ते को गाय के गोबर से लीप कर साफ़ करता है ( रास्ते को इस तरह से बनाता है की चलने वाले के पैर मे कंकर ना चुभे ) उसे अपने अगले सात जन्म ब्रहामण (उच्च कुल ) में जन्म लेता है ।


२.   जो व्यक्ति पंचाम्रित (दूध घी मधू शक्कर दही ) श्री हरी स्वर्ण प्रतीमा को अर्पित करेगा , वह मर्णोप्रांत उच्च  पद प्राप्त करेगा । जो किसी ब्र्हामण को दान मे स्वर्ण , जमीन दान करेगा वह अगले जन्म मे धन्वान होगा और इन्द्र के समान सुख भोगेगा ।

३.   जो श्री हरी को तुलसी दल अर्पित करेगा वह मर्णोप्रांत स्वर्ग मे उच्च पद प्राप्त करेगा और जो श्री हरी की गुग्गल और घी दीप से पूजा करेगा वह असीम धन पायेगा ।

४.   जो पीपल की पूजा करेगा वह वैकुंठ लोक प्राप्त करेगा । दीपदान करने वाला और व्रत कर के हवन करने वाला दिव्य रथ में सवार होकर स्वर्ग जायेगा ।


५.  चातुरमास में गायत्री मंत्र का जप करने वाले से पाप दूर रहते है । शिव की या श्री हरी की स्वर्ण प्रतीमा दान करने वाले से भी पाप दूर रहते है और वह व्यक्ति धनवान बनता है ।

६.  इस दौरान चन्द्रायान का व्रत करने वाले और केवल दूध पी कर रहे उसे ब्रह्मलोक मे स्थान मिलता है और उस व्यक्ति के वंशज प्रलय तक धरती में रहते है । यानी उसके वंश का नाश नही होता ।

७.  जो व्यक्ति चातुरमास के दौरान खट्टा , मीठा और कढ्वा का त्याग करता है उसे ससांरिक दुखों से मुक्ती मिलती है । इसके अलावा चातुरमास में सावन में शाक (पत्ति वाली सब्जी ) भादो में दही का अश्विन में दूध का और कार्तिक में दाल का त्याग करता है वह निरोगी होता है ।

८.   जो व्यक्ति चातुरमास मे शिव या विष्णु का ध्यान करता है और एक ही वक्त भोजन करता है उसे निश्चित ही स्वर्ग मिलता है ।

९.   चातुरमास मे ब्र्हामण की सेवा करने वाले या ब्र्हामण को यथा शक्ति दान देने वाले की उम्र और सम्पदा बढती है । जो व्यक्ति स्वर्ण का सूर्य ब्र्हामण को दान देता है वह हज़ार यग्य के समान पुण्य प्राप्त करता है । 

जो ब्र्हामण का आदर करेगा और चातुरमास के बाद उसे अनाज दान करेगा उसे संपदा और संसारिक सुख की प्राप्ती होगी ।  
जो शिव और गणपती की प्रतिमा किसी ब्र्हमण को दान करता है उसके किसी काम में बाधा नही आती ।

जो व्यक्ति दिन मे नही सोता और सायं काल मे ब्र्हामण को भोजन करवाता है उसे शिव लोक की प्राप्ती होती है ।


१०.                      जो व्यक्ति चातुरमास में उचित व्रत करता है वह गन्धर्वों की कला मे निपुण होता है और स्त्रियों में लोकप्रिय होता है ।

११.                       जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को वश मे रखता है ब्र्हमचार्य का पालन करता करता है और सात्विक रहते हुये अपने इष्ट की सेवा करता है वह कई पुण्य की प्राप्ती करता है ।

सुपारी और तम्बखू का दान करने वाला और चतुरमास में इनका त्याग करना वाला सुंदरता , मधुर वाणी , निरोगी शरीर , समझदारी पाता है । सुपारी का दान धन को बढाता है ।  

माता लक्ष्मी और माता पार्वती को जो हल्दी अर्पित करेगा और व्रत के बाद चांदी के बर्तन में हल्दी का दान करेगा वह अपने जीवनसाथी के साथ समस्त संसारिक सुख भोगते हुए अन्त मे स्वर्ग पायेगा ।

ब्र्हामण को मोती दान करने वाला प्रसिद्धी पायेगा ।

अपनी क्षमता के अनुसार सब्जी, फ़ल , धन और कपढा दान देने वाला राजयोग पायेगा ।  


चातुरमास के उपरांत किसी योग्य ब्र्हामण को दान देना चाहिये और अपने व्रत का उद्यापन करना चाहिये । यह चातुरमास अनेक स्थायी पुण्यों का कारक है तथा हर हिन्दु को इसका लाभ उठाना चाहिये । चातुरमास में भ्रमण करना भी निशेद है ।

आदेश आदेश अलख निरंजन
गुरू गोरखनाथ जी को आदेश
शिव नाथ





Wednesday, 4 July 2018

ब्र्हमाण्ड-शास्त्र






ब्र्हमाण्ड-शास्त्र
अति बलशाली देवराज इन्द्र में अनेकों गुण है । पर देवराज की पदवी स्थाई नही है । सबसे बलशाली, विवेकी , निर्भीक देव ही इस पदवी के लिये चुना जाता है । 

देवराज अत्यधिक चौकन्ने, बलशाली, नीतिवान, कुशल सेनाध्यक्ष , न्याय नीति का जानकार, तिलस्मी , चतुर ,  और विवेकी देव ही बनते है ।  हर देवराज इन्द्र एक मनवन्त्र तक इस पदवी मे रहता है ।

 इसी तरह सभी देव एक निछ्चित समय तक अपनी पदवी में रहते है । अग्नी देव, वायु- देव , देव गुरू, वेदव्यास , वरुण, सुर्य देव,  इत्यादी सभी एक पदवी है जिनमें उचित देवता ही आसीन होता है । उसका काल और शक्तियां लगभग एक मनवन्त्र तक रहती है और उसके बाद फ़िर से चुनाव ….. यही देव कानून है ।

जिस प्रकार अगले मनवन्त्र मे असुर राज बली को देवरज इन्द्र की पदवी मिलना तय है और वेदव्यास की पदवी अश्वथामा जी को । अश्वथामा को उससे अगले मन्वन्त्र मे सप्त्रिशियों मे एक बनना तय है ।

हर देव पदवी की परिक्षा होती है और जो उतीर्ण हो वो ही पदवी का हकदार होगा । यह परिक्षा हर पदवी के लिये होती है ।

यमराज, चित्रगुप्त , नक्षत्र , प्रजापति , सभी ग्रहों के अधिपती (बुध, शनि, सोम, मंगल, धरा, इत्यादी) । उतीर्ण देव , उपदेव , असुर , सिद्ध …. जो भी परिक्षा में सफ़ल हो उसे पदवी और उससे संबधित जिम्मेवारी दी जाती है ।

ब्र्ह्माण्ड  सुचारु रूप से चले इसके लिये कुछ पद बनाये गये । अलग अलग लोक से पद भरे भी गये ।

 इन परिक्षाओं मे   देवता ,यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, नारदा, शारदा, नाग , अघोरी , यक्षणियां, ऋषी पत्त्निया, अनंत सिद्ध, मुनी , साधू , संत , सन्यासी , बैरागी , मडी वेताल , शाकिनी , डाकिनी , डैन , चुडैल , फनिद्रा ,भूत ,प्रेतात्मा ,वीर ,प्रमथ , जिन्न  -  इत्यादी कई प्रजातियां भाग लेती है ।

उधारण के लिये समस्त देवो में श्री गणेश ने प्रतियोगिता जीत कर प्रथम पूज्य और गणाघ्य्क्ष के पद के लिये चुने गये ।

परम ज्ञानी देवता  और सुर्य पुत्र “यम”  मृत्यु के अधिपती बने और साथ मे दक्षिण दिशा के दिकपाल  का पदभार भी संभाला ।


कई देवियां नदियों की अधिपती बनी और कई देव ग्रहो और पर्वतों के अधिपती बने ।

नक्षत्रों ने राहु- केतु को भाग्य फ़ल का भार दिया और शिव पुत्र श्री कार्तिकय अपने विषेश गुणों के कारण नक्षत्रों के अधिपती बने और अपनी वीरता के कारण देव-सेनापती का पदभार भी संभाला


इसके अलावा कितने ही पिशाच , प्रेत, डाकिनि, शाकिनि , शक्तियां , चुडैल , फनिद्रा ,भूत  इत्यादी अस्त्रों – शस्त्रों , वज्र , चक्र , बाण , त्रिशूल , गदा , पाश इत्यादी के अधिपती बने । अस्त्र मे इनका आवाहन करने मे ये शक्तियां उस अस्त्र मे खुद विराजमान होती है और आवाहान करने वाले का कार्य सिद्ध करती है ।


जैसे सिद्ध रावण को मारने के लिये श्री राम ने देवि तारा का आवाहन करा था । देवि तारा श्री राम के बाण मे विराजमान हो गयी थी और रावन का वध बाण ने नही देवी तारा ने करा था ।


यह अस्त्र दिव्य अस्त्र की श्रेणी मे आते है और साधक को इन्हे पाने के लिये खास साधना करनी पडती है । इसके अलावा कुछ अस्त्र प्रदान भी करे जाते है योग्यता के अनुसार ।


श्री हरी विष्णु के साथ नौ नाथ , नौ नाग और चौरासी सिद्ध ब्र्हमाण्ड का कार्य भार संभालते है ।

यह सभी पदाधिकारियों के कार्य क्षेत्र में  चौदह लोकों के अलावा भुमण्डल का भी भार आता है ।

यह दण्ड/ पुरस्कार अपने कार्यक्षेत्र  में देते है जैसे की पहले से ही लिखे गये है । यह ब्र्हमाण्ड के नियम है और इनमे कर्म का बहुत ही महत्व है । 

इस प्रकार हमारा यह ब्र्हमाण्ड सुचारु रूप से चलता है । यही लोकपाल – दिकपाल ,देव, क्षेत्रपाल , इत्यादी हमारे पूज्य है और मानव इन्ही की पूजा करते है ।


यह सभी शक्तियां पूर्ण रूप से जाग्रत रहती है और अपने कार्यक्षेत्र में सावधानी से अपना कार्य करतीं है । इन्हे प्राप्त विषेश शक्तियां इन्हे अपने कार्य करने मे मदद करती है । हर पद के लिये पदाधिकारी को विषेश अस्त्र और शक्ती प्रदान करी जाती है ।


उध्हारण  के लिये श्री हरी विष्णु जी को कुमुद गदा, सारंग धनुष तथा सुदर्शन चक्र प्रदान करा गया । यह सभी अस्त्र पूरी तरह से जाग्रत है और अपने स्वामी का हर आदेश मानने को तत्पर भी ।


यह हमारे ब्र्ह्माण्ड की कार्य शैली है । इस प्रकार से सब सुचारू रूप से चलता है । बिना किसी रुकावट के ।


आदेश आदेश सदगुरू श्री योदी योगेन्द्रनाथ जी को आदेश

गुरू गोरक्षनाथ जी को आदेश


Thursday, 3 May 2018

सभी हिन्दु धर्म के विरोधी क्यों






सभी हिन्दु धर्म के विरोधी क्यों

आदी काल में सभी बुरी और आसुरी शक्तियां आपस में लडती थी पर हिन्दु का दमन करने के लिये सभी एक हो जाती थी । पूरे समाज में सभी का दुश्मन हिन्दु ही रहता था । सभी हिन्दु देवि-देवता उनके दुश्मन थे ।


आज भी यही स्थिती है । सभी का दुश्मन सिर्फ़ हिन्दु है । कमाल की बात तो यह है की कुछ हिन्दु ही अपने धर्म को नीच बताने की कोशिश कर रहे है । चाहे भारत में मे देख लो या विश्वे मे अन्य कहीं । आईये जाने इसका कारण क्या है ।


हिन्दु धर्म में सत गुण सबसे ज्यादा है । मंत्र, ध्यान, योग, हवन और पाठ सभी मिल कर वातावरण को सत तत्व से भर देतें है ।


 इसके अलावा हिन्दु धर्म में आचरण, प्रथायें त्योहार, और प्रेम सत तत्व को बल देता है । इससे शुभ और देव शक्तियां बलवान होती है और पूरे ब्र्ह्माण्ड मे सत तत्व का प्राहाव कर देती है ।

ऐसा होने से तमस शक्तियां बल हीन होकर बहुत निचले स्तर में पहुंच जाती है । आसुरी और काली (बुरी) शक्तियां बल-हीन होकर असाहय हो जाती है ।


सभी आसुरी और काली शक्तियां हिन्दु धर्म के तेज को सह नही पाती और तडप कर मृतप्राय हो जाती है । यह सभी आसुरी शक्तियां (सभी प्रकार की) एक दूसरे के साथ तो रह सकती है परन्तु सत गुण के बडने से परेशान हो जाती है ।



इसी लिये इन सब के फ़लने फ़ूलने के लिये जरूरी है की सत गुण कम हो या ना ही हो । इन का दुश्मन सत गुण ही है । और हिन्दु धर्म सत गुण को बल देता है । सिर्फ़ बल ही नही देता बल्कि तमस का नाश भी कर देता है । 



पर तमस या तमस गुणा क्या है ?


तमस अज्ञान का अंधकार है । कौन सी बात अच्छी है और कौन सी बुरी ये यथार्थ पता नहीं चलता और इस स्वभाव के व्यक्ति को ये जानने की जिज्ञासा भी नहीं होती। 

तमस एक शक्ति होती है जो कि अंधकारमौतविनाश और अज्ञानता, सुस्ती और प्रतिरोध को बढ़ावा देती है। तमस -प्रभावित जीवन का परिणाम कर्म के अनुसार अवगुण होता है; एक निम्न जीवन-रूप में पदावनति है।


एक तामसिक जीवन को आलस्य, लापरवाही, द्वेष, धोखाधड़ी, असंवेदनशीलता, आलोचना और गलती ढूंढना, कुंठा, लक्ष्यहीन जीवन, तार्किक सोच या योजना की कमी और बहाने बनाना, द्वारा चिह्नित किया जाता है। तामसिक गतिविधियों में ज्यादा खाना अधिक सोना और / या ड्रग्स और मदिरा का सेवन शामिल है। यह सबसे नकारात्मक गुण होता है ,  तमस सबसे निम्न, भारी, धीमी और सुस्त सबसे होता है (उदाहरण के लिए, पृथ्वी का एक पत्थर या गांठ). यह राजस की ऊर्जा और सत्त्व की चमक से रहित होता है।

तमस का कभी भी तमस द्वारा विरोध नहीं किया जा सकता है। इसका प्रतिरोध रजस (कार्रवाई) के माध्यम से किया जा सकता है और तमस से सीधे सत्त्व में परिवर्तित करना और भी मुश्किल हो सकता है।
इसी लिये जो पथ तमस का नाश करे वो उस शक्ति का दुश्मन है । 

 हिन्दु धर्म इसका सबसे बडा दुश्मन है । हिन्दु धर्म में रज तत्व और सत तत्व को बल मि?ता है और तमस को यह शक्तिहीन कर देता है ।

रजस गुण
इनमें रजस् मध्यम स्वभाव है जिसके प्रधान होने पर व्यक्ति यथार्थ जानता तो है पर लौकिक सुखों की इच्छा के कारण उपयुक्त समय उपयुक्त कार्य नहीं कर पाता है। 
उदाहरणार्थ किसी व्यक्ति को पता हो कि उसके बॉस ने किसी के साथ अन्याय किया हो लेकिन अपनी पदोन्नति के लोभ में वो उसकी आलोचना या अपनी नाख़ुशी नहीं जताता है। 


सत गुण
सत वो है जो उचित-अनुचित, अच्छा-बुरा और सुख-दुख में भेद और परिमाण हर स्थिति में बता सके। सतोगुण के लोग इस ज्ञान से भरे होते हैं कि किस स्थिति में क्या करना चाहिए और इस तरह उन्हें घबराहट नहीं होती क्योंकि वे तत्वदर्शी होते हैं।

आदेश आदेश
गुरू गोरक्षनाथ जी को आदेश.
सद गुरू जी को आदेश
------ शिवनाथ