Thursday, 3 May 2018

सभी हिन्दु धर्म के विरोधी क्यों






सभी हिन्दु धर्म के विरोधी क्यों

आदी काल में सभी बुरी और आसुरी शक्तियां आपस में लडती थी पर हिन्दु का दमन करने के लिये सभी एक हो जाती थी । पूरे समाज में सभी का दुश्मन हिन्दु ही रहता था । सभी हिन्दु देवि-देवता उनके दुश्मन थे ।


आज भी यही स्थिती है । सभी का दुश्मन सिर्फ़ हिन्दु है । कमाल की बात तो यह है की कुछ हिन्दु ही अपने धर्म को नीच बताने की कोशिश कर रहे है । चाहे भारत में मे देख लो या विश्वे मे अन्य कहीं । आईये जाने इसका कारण क्या है ।


हिन्दु धर्म में सत गुण सबसे ज्यादा है । मंत्र, ध्यान, योग, हवन और पाठ सभी मिल कर वातावरण को सत तत्व से भर देतें है ।


 इसके अलावा हिन्दु धर्म में आचरण, प्रथायें त्योहार, और प्रेम सत तत्व को बल देता है । इससे शुभ और देव शक्तियां बलवान होती है और पूरे ब्र्ह्माण्ड मे सत तत्व का प्राहाव कर देती है ।

ऐसा होने से तमस शक्तियां बल हीन होकर बहुत निचले स्तर में पहुंच जाती है । आसुरी और काली (बुरी) शक्तियां बल-हीन होकर असाहय हो जाती है ।


सभी आसुरी और काली शक्तियां हिन्दु धर्म के तेज को सह नही पाती और तडप कर मृतप्राय हो जाती है । यह सभी आसुरी शक्तियां (सभी प्रकार की) एक दूसरे के साथ तो रह सकती है परन्तु सत गुण के बडने से परेशान हो जाती है ।



इसी लिये इन सब के फ़लने फ़ूलने के लिये जरूरी है की सत गुण कम हो या ना ही हो । इन का दुश्मन सत गुण ही है । और हिन्दु धर्म सत गुण को बल देता है । सिर्फ़ बल ही नही देता बल्कि तमस का नाश भी कर देता है । 



पर तमस या तमस गुणा क्या है ?


तमस अज्ञान का अंधकार है । कौन सी बात अच्छी है और कौन सी बुरी ये यथार्थ पता नहीं चलता और इस स्वभाव के व्यक्ति को ये जानने की जिज्ञासा भी नहीं होती। 

तमस एक शक्ति होती है जो कि अंधकारमौतविनाश और अज्ञानता, सुस्ती और प्रतिरोध को बढ़ावा देती है। तमस -प्रभावित जीवन का परिणाम कर्म के अनुसार अवगुण होता है; एक निम्न जीवन-रूप में पदावनति है।


एक तामसिक जीवन को आलस्य, लापरवाही, द्वेष, धोखाधड़ी, असंवेदनशीलता, आलोचना और गलती ढूंढना, कुंठा, लक्ष्यहीन जीवन, तार्किक सोच या योजना की कमी और बहाने बनाना, द्वारा चिह्नित किया जाता है। तामसिक गतिविधियों में ज्यादा खाना अधिक सोना और / या ड्रग्स और मदिरा का सेवन शामिल है। यह सबसे नकारात्मक गुण होता है ,  तमस सबसे निम्न, भारी, धीमी और सुस्त सबसे होता है (उदाहरण के लिए, पृथ्वी का एक पत्थर या गांठ). यह राजस की ऊर्जा और सत्त्व की चमक से रहित होता है।

तमस का कभी भी तमस द्वारा विरोध नहीं किया जा सकता है। इसका प्रतिरोध रजस (कार्रवाई) के माध्यम से किया जा सकता है और तमस से सीधे सत्त्व में परिवर्तित करना और भी मुश्किल हो सकता है।
इसी लिये जो पथ तमस का नाश करे वो उस शक्ति का दुश्मन है । 

 हिन्दु धर्म इसका सबसे बडा दुश्मन है । हिन्दु धर्म में रज तत्व और सत तत्व को बल मि?ता है और तमस को यह शक्तिहीन कर देता है ।

रजस गुण
इनमें रजस् मध्यम स्वभाव है जिसके प्रधान होने पर व्यक्ति यथार्थ जानता तो है पर लौकिक सुखों की इच्छा के कारण उपयुक्त समय उपयुक्त कार्य नहीं कर पाता है। 
उदाहरणार्थ किसी व्यक्ति को पता हो कि उसके बॉस ने किसी के साथ अन्याय किया हो लेकिन अपनी पदोन्नति के लोभ में वो उसकी आलोचना या अपनी नाख़ुशी नहीं जताता है। 


सत गुण
सत वो है जो उचित-अनुचित, अच्छा-बुरा और सुख-दुख में भेद और परिमाण हर स्थिति में बता सके। सतोगुण के लोग इस ज्ञान से भरे होते हैं कि किस स्थिति में क्या करना चाहिए और इस तरह उन्हें घबराहट नहीं होती क्योंकि वे तत्वदर्शी होते हैं।

आदेश आदेश
गुरू गोरक्षनाथ जी को आदेश.
सद गुरू जी को आदेश
------ शिवनाथ


 

   

Monday, 23 April 2018

धर्म को जीवित रखने के चार स्तम्भ





किसी भी विचारधारा / पन्थ / धर्म को जीवित रखने और उसका विस्तार करने के लिये चार स्तम्भ होने जरूरी है ।

आज हम हिन्दु धर्म की बात करेंगे ………..

१.  समाज, समय और परिस्थिती के अनुसार उसमें ठोडा लचीलापन होना चाहिये।
-    हिन्दु धर्म लचीला है । समय के साथ इस धर्म ने अपने को लचीला बनाया है ।

२.  लोगो का समूह जो इसमे आस्था रखे और इसकी परम्परायें निभाये । जो मन्दिर जाये , त्योहार मनाये और आस्था रखें ।

-    हिन्दू धर्म में यह स्तम्भ भी अभी जीवित है । हिन्दु व्रत रखते है, भण्डारें लगाते है , मन्दिर में श्रद्धा से जाते है और निज त्योहार भी मनाते है ।

अपने धर्म के चिन्न्हों को सम्मान से देखते है । (साधु , ब्र्हामण , स्वस्तिक , अपने देवि देवता के चित्र और मूर्तियां और उनसे जुडे धार्मिक चिन्न्ह का अपमान नही करते)


३.  वो लोगो का समुह जो सामर्थ्यवान है और धन से, अपने सामर्थ्य से और शक्ती से धर्म को बल दे । अगर धन नही दे सकता तो सेवा से अपने धर्म को जीवित रखने का प्र्यास करे ।
-    हिन्दू धर्म में यह स्तम्भ कमज़ोर हो चुका है । बहुत कम लोग धन (दान) देना पसन्द करते है । सेवा और शरीर कर्म भी स्मर्पित नही करना चाहते । खुद तो कुछ करते नही और दूसरे लोगो को भी रोकने का प्र्यास करते है ।

४.  वह समूह जो विद्वान है और अपने धर्म के समर्थन मे लिखता है और अपने धर्म से लोगो को परीचित करवाता है । अपनी प्रथाओं का उचित तरह से पालन करवाता है । लोगो को अपने धर्म की अच्छी बाते बताता है और स्व धर्म से गर्व करना सिखाता है ।
-    हिन्दु धर्म में यह स्तम्भ पूरी तरह धव्सत हो चुका है । बल्की यही लोग हिन्दु धर्म का मज़ाक उडाते है और बाकी स्तम्भो को शर्मिन्दा करते है । लोगो से अपील करते है की दान मत दो । मन्दिर मत जाओ । तुम्हारे त्योहार शर्मिन्दा होने के कारण हैइन्हे मत मनाओ। इत्यादी ।

मेरे हिन्दु भाईयो जागो । अपने धर्म के बारे मे जानकारी लो….अपने बच्चो को सिखाओ और अगर कोई इसका तिरस्कार करे तो उसे उचित जवाब दो । हम एक ही है । हम से अनेक गुरू निकले है और अनेक अवतार । योग , ध्यान , किर्तन , कला , कर्म काण्ड , जप और हवनहमारे ही अन्ग है ।हम नाथ है , हम ही सिख , हम अघोरी भी है और शैव-वैष्ण्व भी हम ही है । हम लोग ही जंगमलिन्ग्यात है और हम लोग ही गुग्गा पीर है । 

  

आज हिन्दु धर्म सिर्फ़ दो स्तम्भों के सहारे ही खडा है । अगर येह दो स्तम्भ भी गिर गये तो हिन्दु खत्म हो जायेगा ।

  

Saturday, 3 February 2018

विष्णु रहस्य और आदी शिव









विष्णु रहस्य और आदी शिव



शुरूआत में कुछ भी नही था ……. ना कोई रौशनी ना ही अन्धकार ….. ना ब्र्हमाण्ड सिर्फ़ खाली जगह । वहां पर विचरती थी शुद्ध आत्मा …..प्रकाशवान, निराकार, परमब्र्हम आदी शिव या सदा शिव और उनकी कुण्डिलिणि शक्ति महा माया।

महा माया के विचरने से अनेकों ब्र्हमाण्ड रचित हो गये । यह सब खाली जगह ही थी पर अलग-अलग। 


ऐसे ही विचरते उनके मन मे विचार आया एक से अनेक होने का …….. और उनके वाम (बायें) भाग से प्रकट हुई एक और शक्ति ।
 यह शक्ति आदि शिव के समान ही थी, निराकार ।

वह शक्ति बहुत नम्रता से आदी शिव और महा माया के सामने झुकी और बोली … “ हे नाथ मैं कौन हूं मेरा क्या नाम है और मुझे क्या करना है ।

सदा-शिव और महा माया ने अपने उस पुत्र का नाम विष्णु रखा और उसे तपस्या करने को कहा ।

श्री विष्णु अगले 1000 देव वर्ष  तक तपस्या में लीन रहे और फ़िर उनके दिव्य शरीर से जल निकलना शुरू हुआ । उस जल ने समस्त ब्र्हमाण्ड को भर दिया ।

तब यह शक्ति (विष्णु) तीन भागों मे विभाजित हो गयी ।
१.  कारणोंदकशायी विष्णु या महा विष्णु 
२.  गर्भोदकशायी विष्णु
३.  क्षीरोदकशायी विष्णु
महा विष्णु (कारणोंदकशायी विष्णु)
  निराकार जो करणोंदक पर विराजमान है । यही संसार का बीज डालते है । अग्नी, आकाश, जल, धरती और इसके अलावा मन, समझ, अहंकार इत्यादी । यही सब कारणों का कारण है । महामाया द्वारा रचित समस्त ब्र्हमाण्डो की आत्मा के रूप मे यह एक हजार नेत्र और एक हजार भुजाओं के साथ चरित्र होते है ।


गर्भोदकशायी विष्णु
महा विष्णु (कारणोंदकशायी विष्णु ) उन सभी महा माया द्वारा रचित ब्र्हमाण्डों मे गर्भोदकशायी विष्णु के रूप मे प्रवेष करते हैं । हर एक ब्र्हमाण्ड मे एक गर्भोदकशायी विष्णु यह गर्भोदकशायी विष्णु अलग-अलग महा माया द्वारा रचित ब्र्हमाण्डों की आत्माओं की आत्मा है । इन्ही की नाभी से ब्र्ह्मा जी की उत्पती होती है ।

क्षीरोदकशायी विष्णु
गर्भोदक्सयि विष्णु हर ब्र्हमाण्ड में जीवित शरीरों मे क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में बसते है । जब हम कहते है की कण कण, हर शरीर मे भगवान है तो हम क्षीरोदकशायी विष्णु की बात करते है ।
श्री हरी विष्णु, जिनके पास देवता मदद मांगने जाते है या जिन्हे हम परमात्मा कहते है वह क्षीरोदकशायी विष्णु  ही है । 
  
सर्वाणि तत्र भूतानि वसन्‍ति परमात्‍मनि 
भूतेषु   सर्वात्‍मा वासुदेवस्‍तत: स्‍मृत: ।।


पुराने ग्रन्थों के अनुसार नारायण आदी शिव का ही रूप है । शिव ही नारायण है और शिव की शक्ति महा माया ही नारायणी है । शिव की कुण्डिलिणि शक्ति ही महा माया या नारायणी के नाम से जानी जाती है । वही अलग अलग रूप मे विश्व में विचरती है और उसे स्पन्दन प्रदान करती है । यह अनन्त शक्ति (आदी शिव) जब अकेली है तो योगी (शिव) के रूप में है जब पालन करती है तो राजा (विष्णु) के रूप मे है ।


यही शक्ति अलग अलग कारण से अलग अलग रूप में प्रकट होती रहती है और समस्त ब्र्हमाण्ड का पालन करती है ।यह दिव्य शक्ति हर वक्त समस्त चर-अचर ब्र्हमाण्ड को बांधे रखती है और उसका संचालन करती है । इसी शिव शक्ति को ध्यान के समय में योगी ग्रहण करता है ।


नव नारायाण और नव नाथ
नव नारायण उन नौ नागों को शक्ति देतें है जो इस सकल ब्र्हमाण्ड मे आध्यात्मिक कुण्लिणी शक्ति के रूप में विराजमान है । इसे ही हम विश्व कुण्डिलिनि कहते है । इनके सकल अवतार इस प्रकार से है ।

नव नाथ
किसका अवतार
नव नाथ
किस का अवतार
मत्स्येन्द्र नाथ
कवि नारायण
गोपिचन्द्र नाथ
द्रुमिल नारायण
जलंधर नाथ
अन्तरिक्ष नारायण   
कनिफ़ नाथ
प्रबुद्ध नारायण  
चर्पट नाथ
पिप्प्लायन नारायण  
नाग नाथ
अविर्होत्र नारायण  
भर्त्रुहरि नाथ
हरी नारायण
रेवा नाथ
चमस नारायण  
गहिनि नाथ
करभज नारायण



आदिनाथ शिव और गोरक्षनाथ इस सूची में नही है । आदिनाथ शिव ज्योती स्वरूप के अवतार ही है । यही ओमंकार स्वरूप है । यानी परमब्र्हम शुद्ध आत्मा , निराकार और प्रकाशवान । जिनकी कुण्डिलिनी शक्ति आदि शक्ति महा माया है । गुरु गोरक्षनाथ जी शिव स्वरूप यानी आदि शिव ही है । या हम कह सकते है की शिव और गोरक्षनाथ एक ही है ।


जिस प्रकार सप्तरिशि , ६ मनु , इन्द्र इत्यादी हर मन्वन्त्र मे बदलते रहते है उसी प्रकार नव नाथ भी । पर आदि नाथ शिव और गुरू गोरक्षनाथ नही बदलते ।
आदेश आदेश
गुरू गोरक्षनाथ जी को आदेश
ओम शिव गोरक्ष